देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी जियो प्लेटफॉर्म और दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी फ़ेसबुक के साथ आने से बेशक रेग्युलेशन को लेकर कुछ सवाल उठ रहे हैं, मगर यह सौदा देश मे किराना की पारंपरिक खरीदारी की तस्वीर बदल सकता है।
ऐसे समय जब सारी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है और भारत सबसे बड़े लॉकडाउन का सामना कर रहा है, दूरसंचार क्षेत्र के दिग्गज मुकेश अंबानी और सोशल मीडिया क्षेत्र के दिग्गज मार्क जुकरबर्ग ने हाथ मिलाया, जिससे देश मे दूरसंचार क्षेत्र के साथ ही खुदरा किराना के कारोबार में स्वाभाविक ही हलचल मच गई है। दोनों के बीच हुए करार के मुताबिक जुकरबर्ग के स्वामित्व वाली फेसबुक मुकेश के स्वामित्व वाले रिलायंस जियो प्लेटफॉर्म में 43547 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे उसे 9.99 फीसदी की हिस्सेदारी मिल जाएगी। बताया गया है कि फेसबुक से जुड़े व्हाट्सएप्प को रिलायंस के जियो मार्ट से जोड़ा जाएगा और इस तरह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार होगा,जिसके जरिए देश के करोड़ों उपभोक्ता अपने पड़ोस में स्थित किराना दुकान से खरीदारी कर सकेंगे। इस कोरोना काल मे इसे बेहतर ढंग से समझा जा सकता है, जब लॉकडाउन की वजह से बड़े माल और बाजार बंद हैं, और रोजाना की जरूरतो के भी ऑनलाइन खरीदारी बढ़ गई है। यह सौदा कितना बड़ा है और इसका असर कहा तक होगा, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि इंटरनेशनल डाटा रिसर्च के मुताबिक भारत में 45 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन है, हर तीन स्मार्टफोन में से दो में व्हाट्सएप्प उपलब्ध है और चार साल पहले अस्तित्व में आई देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी जियो के पास 38 करोड़ से अधिक उपभोक्ता है। इस सौदे से 40 हजार करोड़ रुपये के कर्ज से लदी जियो प्लेटफॉर्म को राहत मिलेगी। मगर इसका व्यापक पहलू देश मे कितना कारोबार, किसानों के हक, उपभोक्ताओं के व्यवहार और ऑनलाइन कारोबार तथा दूरसंचार कंपनियों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा है, जिससे कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। बेशक, जियो-फ़ेसबुक के साथ आने से उनकी वालमार्ट और अमेजन जैसी कंपनियो के साथ होड़ मच सकती है, जिसका लाभ उपभोक्ता, उत्पादक और दुकानदार इन सबको बेहतर विकल्प चुनने के रूप में मिल सकता है। इसके बाबजूद एक बड़ा सवाल रेग्युलेशन से जुड़ा है, क्योंकि ये दोनों कंपनिया अपने-अपने क्षेत्र की दिग्गज हैं और उनके साथ आने से बाजार में एकाधिकार की चुनौती पैदा होगी। मगर यह तय है कि यह सौदा देश मे किराना की पारंपरिक खरीदारी की तस्वीर बदल सकता है।
(Source-अमरउजाला)
ऐसे समय जब सारी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है और भारत सबसे बड़े लॉकडाउन का सामना कर रहा है, दूरसंचार क्षेत्र के दिग्गज मुकेश अंबानी और सोशल मीडिया क्षेत्र के दिग्गज मार्क जुकरबर्ग ने हाथ मिलाया, जिससे देश मे दूरसंचार क्षेत्र के साथ ही खुदरा किराना के कारोबार में स्वाभाविक ही हलचल मच गई है। दोनों के बीच हुए करार के मुताबिक जुकरबर्ग के स्वामित्व वाली फेसबुक मुकेश के स्वामित्व वाले रिलायंस जियो प्लेटफॉर्म में 43547 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे उसे 9.99 फीसदी की हिस्सेदारी मिल जाएगी। बताया गया है कि फेसबुक से जुड़े व्हाट्सएप्प को रिलायंस के जियो मार्ट से जोड़ा जाएगा और इस तरह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार होगा,जिसके जरिए देश के करोड़ों उपभोक्ता अपने पड़ोस में स्थित किराना दुकान से खरीदारी कर सकेंगे। इस कोरोना काल मे इसे बेहतर ढंग से समझा जा सकता है, जब लॉकडाउन की वजह से बड़े माल और बाजार बंद हैं, और रोजाना की जरूरतो के भी ऑनलाइन खरीदारी बढ़ गई है। यह सौदा कितना बड़ा है और इसका असर कहा तक होगा, इसे ऐसे समझा जा सकता है कि इंटरनेशनल डाटा रिसर्च के मुताबिक भारत में 45 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन है, हर तीन स्मार्टफोन में से दो में व्हाट्सएप्प उपलब्ध है और चार साल पहले अस्तित्व में आई देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी जियो के पास 38 करोड़ से अधिक उपभोक्ता है। इस सौदे से 40 हजार करोड़ रुपये के कर्ज से लदी जियो प्लेटफॉर्म को राहत मिलेगी। मगर इसका व्यापक पहलू देश मे कितना कारोबार, किसानों के हक, उपभोक्ताओं के व्यवहार और ऑनलाइन कारोबार तथा दूरसंचार कंपनियों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा है, जिससे कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। बेशक, जियो-फ़ेसबुक के साथ आने से उनकी वालमार्ट और अमेजन जैसी कंपनियो के साथ होड़ मच सकती है, जिसका लाभ उपभोक्ता, उत्पादक और दुकानदार इन सबको बेहतर विकल्प चुनने के रूप में मिल सकता है। इसके बाबजूद एक बड़ा सवाल रेग्युलेशन से जुड़ा है, क्योंकि ये दोनों कंपनिया अपने-अपने क्षेत्र की दिग्गज हैं और उनके साथ आने से बाजार में एकाधिकार की चुनौती पैदा होगी। मगर यह तय है कि यह सौदा देश मे किराना की पारंपरिक खरीदारी की तस्वीर बदल सकता है।(Source-अमरउजाला)
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Reviewed by Akash
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April 26, 2020
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